खुद को देखा नही


दूर खड़ी उस मंज़िल तक
तारों से ले के कंदील तक
मैंने खुद को देखा है कहाँ।

दर्द के दर पर दस्तक से
खुशियों की उस खोली तक
मैंने खुद को देखा है कहाँ।

मैंने खुद से खुद को छुपाया
मैंने खुद से खुद को चुराया
मैंने खुद को अपना बनाया (2)
पाताल से ले के अंबर तक
मैंने खुद को देखा है कहाँ।

मैं कौन हूं क्या हूं क्यों हूं
मैं क्यों इतना पागल हूं (2)
मेरी धड़कन से जज़्बातों तक
मैंने खुद को पूछा है कहाँ।

मैं खुद पे हूं क्यों मरता
क्यों आवारा हूं फिरता (2)
मन की गलियों के मंज़र तक
मैंने खुद को सोचा है कहाँ।

Comments

  1. आप का अंदाज ही शायराना है , बस ।

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